विश्वास अभी भी बाकी है - लघुकथा

  विश्वास अभी भी बाकी है -  लघुकथा


वह महानगर की इस बड़ी सी सोसायटी में रहने के लिए आया था. सामान आदि कुछ व्यवस्थित कर लेने के उपरांत, किचन भी शुरू हो गया था. सुबह दस बजे के आस-पास वह सब्जी खरीदने के लिए सोसायटी कंपाउंड से बाहर आया.


सोसायटी के गेट से थोड़ा हटकर सड़क और फुटपाथ पर फल सब्जियां आदि बेचने वालों के ठेले लगे थे. वह ठेले वालों के पास न जाकर, फुटपाथ पर सब्जियों का ढेर लगाए, ऊपर से तिरपाल से ढकी दुकाननुमा जगह में गया. ताजा सब्जियां लकड़ी के फट्टों से बने अस्थायी रैक, टोकरियों और क्रेटों में सजी भरी हुई थीं.



उसने अपनी पसंद की सब्जियां छांटी और तोलने के लिए सब्जी वाले के पास खड़ा हो गया. मोटा, सांवला सा मध्यम आयु का सब्जी वाला फुटपाथ पर बोरी बिछाए, उस पर बैठा बहुत व्यस्त था. कई सारे ग्राहक सब्जी की टोकरियां पकड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. सब्जी वाला फुर्ती से सब्जियों को तौलता, ग्राहकों की थैलियों अथवा अपने पास के कैरी बैग में डाल उन्हें पकड़ाता जा रहा था. जितनी फुर्ती से वह सब्जियां तौल रहा था, उतनी ही तेजी से हिसाब लगाते हुए पैसों का लेन-देन भी करता जा रहा था.


उसकी बारी आई तो सब्जियां तौल चुकने के पश्चात पैसे देने के लिए उसने अपनी जेब में हाथ डाला. उसके पास तीन सौ रुपए ही थे, जबकि बिल साढ़े तीन सौ का बन गया था.

“भइया ! पचास रुपए की सब्जी कम कर दो.”

“क्यों बाबू जी... क्या हो गया ?” सब्जी वाले ने पूछा.

“ में घर से कम पैसे लेकर आया हूं. केवल तीन सी रुपए ही पास में हैं... आप पचास रुपए की सब्जी निकाल लो.”

“अरे बाबूजी! कोई बात नहीं... आप सारी सब्जी ले जाओ. बकाया पैसे कल दे देना." सब्जी वाले ने खुले मन से मुस्कराते हुए कहा.

वह सब्जी वाले से आज पहली बार मिला था. न तो सब्जी वाला, न ही वह एक-दूसरे को पहचानते थे. सब्जी वाले के उस पर विश्वास से वह कुछ हैरान सा हुआ. महानगर में बिना जान पहचान के ऐसी सहृदयता से वह अचंभित था.

अपने पर सब्जी वाले का ऐसा विश्वास देख उसे लगा, दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है.

Comments

Popular posts from this blog

How do fish breathe in water ?

buy gold wisely

Video of girls of Chandigarh University taking bath goes viral